बुधवार, 6 अक्टूबर 2021

A blog by DINESH YADAV: मधेसका अल्पसंख्यक अमात जाति ‘अमात्य’ र ‘राई’ होइनन

A blog by DINESH YADAV: मधेसका अल्पसंख्यक अमात जाति ‘अमात्य’ र ‘राई’ होइनन: काठमाडौं– तराई–मधेसमा वर्षौदेखि बसोबास गर्ने अल्पसंख्यक अमात जातिका अगुवाहरुले राज्यले पहिले नेपालको राष्ट्रिय जातिमा आफूहरुलाई वर्षौसम्म...

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

मधेसी दल


टुक्रा-टुक्रा भएका मधेसी दलहरू एउटै पार्टी हुन निरन्तर गोप्य बैठक र छलफलमा बसेका छन् । मधेसी दलहरूको सकभर एउटै पार्टी हुन नसके मोर्चा बनाएर चुनावमा जाने विषयमा छलफल केेन्दि्रत छन् । 
तराई मधेस लोकतान्त्रिक पार्टीले असारको अन्तिम साता सबै मधेसी दल एकीकृत भएर एउटै पार्टी बनाउन प्रयास सुरु गर्ने निर्णय गरेको थियो । तमलोपाको निर्णयसँगै मधेसी नेताले बैठक र छलफल सुरु गरेका हुन् । 
तमलोपाले पार्टी उपाध्यक्ष हृदयेश त्रिपाठीको संयोजकत्वमा वार्ता समितिसमेत गठन गरेको छ । वार्ता समितिमा जितेन्द्र सोनाल र पुष्पा ठाकुर सदस्य छन् । समितिले मधेसका नाममा स्थापित दललाई एउटै मधेसी दल स्थापनाको पहलका लागि वार्ता र छलफल गर्न जिम्मेवारी पाएको छ । संयोजक त्रिपाठीले मधेसी दलका नेतासँग सामूहिक र व्यक्तिगत छलफल गर्दै आएका छन् । 
मधेसका मुद्दालाई एक भएर उठाउनका लागि एकीकृत हुने विषयमा मधेसी दलका दोस्रो तहका नेताले आगामी शनिबार कुपन्डोलको नाइटिंगेल होटलमा वार्ता गर्दै छन् । वार्तामा मधेसी दलका दोस्रो तहका नेतालाई बोलाइएको छ । 
अघिल्लो शनिबार पनि तमलोपाले मध्यबानेश्वरको समिट होटेलमा छलफल आयोजना गरेको थियो । छलफलमा तमलोपाका वृजेश गुप्ता, विमल केडिया, गोविन्द चौधरी, तमलोपा नेपालबाट दानबहादुर चौधरी, फोरम लोकतान्त्रिकबाट मृगेन्द्र कुरमा सिंह, आशा सरदार, मुमा राम महेता सहभागी थिए । त्यस्तै, फोरम गणतान्त्रिकबाट आत्माराम शाह, सद्भावना पार्टीबाट सरोज यादव, संघीय सद्भावनाबाट रामनरेश राय यादवलगायत नेता बैठकमा सहभागी भएका थिए । सो बैठकमा मधेसी दलहरू शृंखलाबद्ध रूपमा फुटिरहेकाले मधेसी जनतामा नेताप्रति नै नराम्रो सन्देश गएको भन्दै यसलाई चिर्न सबै मधेसी दल एउटै हुनुपर्ने धारणा नेताहरूले राखेका थिए । 
'सबै मधेसी दललाई एउटै पार्टी बनाउन तमलोपाका नेताले बैठक गर्नुभएको थियो । यही विषयमा प्रारम्भिक छलफल भएको हो,' फोरम लोकतान्त्रिककी नेतृ आशा सरदारले नयाँ पत्रिकासँग भनिन्, 'अबको बैठकमा पनि यसबारे थप छलफल हुनेछ ।' तर, सबै मधेसी दल एक हुने सम्भावना कम रहेको उनको भनाइ छ । 'मधेसी दलहरू एउटै हुन सम्भव त देखिएको छैन, तर प्रयास सुरु भएको छ,' उनले भनिन् । 
बैठकको सुरुमै आयोजकका तर्फबाट वृजेश गुप्ताले आगामी चुनावमा मधेसी दलहरू एक हुने गरी आफूहरूले अनौपचारिक छलफल आरम्भ गरेको जानकारी गराएका थिए । दोस्रो तहका नेताको बैठक सकारात्मक भए शीर्ष नेताहरूलाई सहभागी गराई अर्को बैठक गरिने आयोजकको भनाइ थियो । 
तमलोपाले निर्माण गरेको वार्ता समितिका संयोजक हृदयेश त्रिपाठीले भने मधेसी दलका नेताहरूसँग व्यक्तिगत रूपमा भेट्दा आफू उत्साहित भएको बताए । 'मैले व्यक्तिगत रूपमा धेरै मधेसवादी नेतालाई भेटेको छु,' उनले नयाँ पत्रिकासँग भने, 'व्यक्तिगत रूपमा कुरा गर्दा उहाँहरू निकै सकारात्मक भएको पाएको छु ।' 
मधेसी दलहरू एउटै पार्टीमा आबद्ध हुनुपर्ने बाध्यात्मक परिस्थिति आएको उल्लेख गर्दै नेता त्रिपाठीले एकीकृत भएर मधेसका मुद्दा उठाउने बाटोमा मधेसी दलहरू जानैपर्ने बताए । 'यो बाटोमा मधेसवादी दलहरू नगई सुखै छैन,' उनले भने । एउटै पार्टी बनाउन भएका वार्ता र छलफल निराशाजनक नभएको पनि उनको भनाइ छ । 
तर, संघीय सद्भावना पार्टी अध्यक्ष रामनरेश राय यादवले मधेसी दल सबै एउटै पार्टीमा आबद्ध हुनेमा आफू विश्वस्त नरहेको बताए । यादवले भने, 'मधेसी दलहरूलाई एउटै बनाउन उहाँहरूले प्रयास त सुरु गर्नु भएको छ, तर सबै मधेसवादी दल एउटै हुनेमा विश्वास गर्न सकिँदैन ।' 

एउटै पार्टीका लागि

अध्यक्षमण्डलको प्रस्ताव

दर्जनौँ पार्टीमा विभाजित भएका मधेसी दलहरू एउटै पार्टीमा आबद्ध बनाउन तमलोपाले सामूहिक नेतृत्वका रूपमा अध्यक्ष मण्डल राख्ने प्रस्ताव गरेको छ । सबैभन्दा समस्या अध्यक्षमा देखिने भएकाले तमलोपाले यस्तो 
प्रस्ताव गरेको हो । 
तमलोपाले अध्यक्ष मण्डलमा एकभन्दा बढी अध्यक्ष रहने प्रस्ताव गरेको छ । 'एकीकृत पार्टीमा एउटै अध्यक्ष रहने व्यवस्था गर्दा अरू नेतालाई समस्या पर्ने भएकाले हामीले सामूहिक नेतृत्वका लािग अध्यक्ष मण्डल राख्ने प्रस्ताव गरेका छौँ,' तमलोपा उपाध्यक्ष त्रिपाठीले भने ।

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

madheshi maithili

बिमार शान्ति आ संविधान
–दिनेश यादव

माओवादीक विद्रोह (जनयुद्ध) आ मधेश लगायत के क्षेत्र सँ उठान भेल जनआन्दोलनक कारणेँ बिस २०६५ जेठ १५ मे जनताक संविधानसभा द्वारा नेपाल संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र घोषित आ कार्यान्वित भँ २१ वीँ शताब्दीक संस्कृति आ शैली मे नयाँ नेपाल निर्माण दिश आगा बढल छल । नेपाल मे विद्यमान भाँती–भाँती के सामन्ती, शोषण, दमन सँ मुक्ति जनता के भेटत से आश उपेक्षित, पीडित, शोषित आ दमित क्षेत्र , जाति÷जनजाति, समूह आ वर्ग केने छल । एही आशाक किरण प्राप्ति हेतु बिस २०६७ जेठ १४ धरि नेपाल के जनताक लेल सर्वमान्य संविधान निर्माण सम्पन्न कएबाक बात सेहो छल । स्वायत्त क्षेत्रक अंशबन्डा, शासकीय स्वरुपक निर्धारण, राज्यशक्तिक बखराबखरी, राज्य के पुनः संरचना आ निर्वाचन प्रणालीसहित के किछुक विवादास्पद विषय मे सहमति पुगएबाक समय कम भेल कहैत संविधानसभा सँ विस २०६८ जेठ १४ धरि एक वर्ष के लेल म्याद थपल गेल । संविधानसभा आ सभासद सभहक काउछ (कौछ) गति मे चलनायी के कारण निर्धारित समय मे संविधान नय बनल । मुद्दा ओही अवधि मे संविधानसभा के निर्माणक सन्दर्भ मे जनता के द्वारा नय पत्यौल गेल आ पराजित नेतागण राज्य व्यवस्थाक लगाम पकडबाक जिम्मा पावि गेल , निर्वाचित लोक के गैरजिम्मेबार बनौल गेल । दलक नेतासभ मिलिजुली सत्ता केन्द्रित बनल । सत्ता मे पहूँचल फकिर सभ देश आ जनता, मधेश आ मधेशी के लुटबाक, लुछबाक आ पिटबाक लेल ओ सफल भेल । परिणाम एहा भेल जे संविधान निर्माणक लेल थपल गेल म्याद ओहिना बर्बाद भल गेल । बिस २०६८ भादव १४ धरि फेर सँ तीन महिना म्याद बढाओल गेल अछि । मुद्दा अखनो धरी संविधान निर्माणक प्रक्रिया गुरकनाइ से उपर नय उठिँ रहल अछि । एही सँ जनता निराश आ कुन्ठित बनल अछि । जनताक मन मे संविधान नय बनत कि से सशंकित परिस्थिति सिर्जित भेल अछि । किएक त १०९७ दिन (ई लेख तयारी के दिनधरि) मे नय बनि सकल संविधान ४८ दिन मे बनत से कहिनाए मुश्किल अछि ।

शान्ति, संविधान आ सेना समायोजन मुद्दा ः
यतह शान्ति आ संविधानक रटान अखन सब सँ पैघ हास्यास्प्रद विषय बनल अछि । विगत तीन वर्षक अवधि मे मिडिया मे सब सँ बेसी जौ कोनो शब्दक प्रयोग भेल अछि त ओ थिक ‘३ स’ । अर्थात् शान्ति, संविधान आ सेना समायोजन । खास ककेँ संविधान निर्माणक सबाल मे चाहेँ भाषण मेँ हुए या लेख–रचना या समाचार मेँ , ई ‘३ स’ लोकप्रिय रहल , अछि आ अगला बहुतो दिनधरि रहत । नेपाल मे निक चुटकिला बनेबाक मसला सेहो बनि गेल अछि, संविधानसभा आ सभासद, शान्ति आ संविधान । एतबे नए , जनताक भावना पँ ब्रजपात भेल अनुभव चारो दिस सँ भल रहल अछि । खास कँ के प्रमुख तीन दलक राजनीतिक वेइमानीक कारण देश बन्धक बनल अवस्था अछि । ताहि कारणेँ यतह संविधान त अछि मुदा जीवित नय, व्यवस्थापिका त अछि मुदा निकम्मा , सरकार त अछि मुद्दा कामचलाऊ, संविधानसभा त अछि मुदा असहमतिक अखाडा । फलस्वरुप राजनीति मे बाहुबली सभहक बर्चस्प बढि रहल अछि । जनता निराश अछि नेता सभ मालामाल ।
दोसर बात , संविधानसभा मे सर्वहारा वर्गक नाम पर अधिनायकबादक संवाहक बनल माओवादी, लोकतान्त्रिक बहुलबादक कागजी घोडाक सारथी बनल नेपाली कांग्रेस आ नाम सँ मात्र कम्युनिष्ट रही तेसर पोदान पँ रहितोँ सत्ताक सुखलाभ मे मस्त अउर व्यस्त एमाले के कारण देश आ मधेशक स्थिति विस्फोटक बनि रहल अछि । किछ प्रतिशत छोडि माओवादीक आलावा कांग्रेस आ एमाले नेपाली जनता के संविधान देबाक पक्ष मे विल्कुले नय अछि, विगत अवधि के लेखाजोखा कएल जाय त सुगम शैली मे एकर पुष्टि भ सकएत अछि । ओम्हर मधेश या मधेशियाक नाम पर दोकान कएनिहार सभ के भुमिका कम रोचक नय अछि । ओ सभ त ‘कोइ काहो मगन त कोइ काहो मगन’ के स्थिति मे अछि । संविधान बनेबाक दिश कम आ सत्ताक लेमनचुस कतह भेटत तेमरे अपन पाव बढाबैत आबि रहल अछि । बिना अडान आ एजेन्डाक राजनीतिक कएनिहार  सभहक काम त हुलुक बुलुक केनाय सँ बेसीँ आर किछ किई भ सकैत अछि ? खास कँके सत्ता आ भत्ता मे रमैत रहनिहार सभक केँ त गप्पे छोडि दिऔं । मधेश आ मधेशियाक हित मे संविधान कोना बनाओल जाय तही दिस मधेशी नेता के किन्नौ चिन्ता नए । ओ सब भाषण के लेल भाषण मे सीमित भ रहल अछि । ताहिँ कारणेँ मधेशीया नेता आ दल सभक आब त फरक रुप मे वर्गिकरण से हो शुरु भँ चुकल अछि । मधेशवादी या मधेशकेन्द्रित, तराई–मधेशकेन्द्रित या तराई–मधेश–पहाड केन्द्रित । स्पष्ट उदेश्य आ लक्षित समूह के निक्र्यौल नय भेला सँ मधेशीयाक नेतृत्व मे रहल दल एम्हर ओम्हर करैत आबि रहल अछि । अहीँ तहकेँ विभाजन स थोडाबहुत मधेशीबादी केँ फाइदा त भेटत, मुद्दा ओ निर्णायक किन्नौह नए भँ सकैत अछि । ताही लेल काँटी मधेशबाद के नांगैरी (पुछरीं) पकडि वैतरनी पार कएबाक सोचि मे रहल दल सेहो बिना एजेन्डा के राजनीतिक दौड मे समावेश भेला सँ बचबाक चाही । बाँकी सबटा के नाम के आगा मधेशी या तराई–मधेश त अछि मुद्दा ओ मधेशवादी कहाबैलायक नए अछि । किएक त हुनका सभक जन्म के बाद छठिहारी भेला बेसी दिन नए भेल अछि । ओ सभ अपना के खुलि के मधेशकेन्द्रित त कहैत अछि मुद्दा हुनक आत्मज्ञान आ ब्रह्मज्ञान ‘राष्ट्रिय पार्टी’ के निर्देशित करैत अछि । ओना त मधेशिया नेता सभ बामपन्थी, एमालेपन्थी, कांग्रेसपन्थी आ माओवादीपन्थी त अइछे, आब राजेन्द्रपन्थी, उपेन्द्रपन्थी, महेन्द्रपन्थी, महन्थपन्थी, विजयपन्थी, जयप्रकाशपन्थी तरफ अग्रसर होमे लागल । फलस्वरूप एकटा नेता दोसर के नेतृत्व स्वीकार करबाक तयार नए अछि । संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा के कार्यशैली के प्रकृति आ चरित्र जौ देखब त ई बात स्पष्ट भँ याजत । अहिठाम ई अर्थ किन्नौह नए लगायल जाए कि स्तम्भकार मोर्चा विरोधी थिक ।
मधेशियाक नेतृत्व मे रहल दल सभ मे कन्फुस्की स शुरु भेल द्वन्द्व कनघुस्की मे पहूँछ जाएत अछि । कनघुस्की के अर्थ एतह पार्टी फोड्नाय अछि । जौ ई स्थिति रहत त मधेशक पक्ष मे संविधान नहिए टा बनत । कहबी अछि बिचार भिन्नता सँ द्वन्द्वक जन्म होयत अछि । मुद्दा लोकतन्त्र मे विचारक मन्थन आ शान्तिपूर्ण संवाद त सर्वोत्तम स्वीकृत उपाय अछि ने । मुद्दा मन्थन सकारात्मक होबाक चाही, अप्पन व्यक्तिगत स्वार्थ केँ गन्ध नए रहबाक चाहीँ । पिछला समय मे मधेशियाक नेतृत्व मे रहल पाँच दलक मोर्चा सकारात्मक बात अछि । मुद्दा ओ मधेशी के हकअधिकार के लिपीबद्ध कए मधेशक पक्ष मे संविधान कोना बनत , तेम्हर ध्यान नय दँ खाली बखेडाबाजी मे देखमा मे आबि अछि । संविधान मे हमरा ई–ई चाहीँ से कहएबाक समय मे सत्ताधारी दल सभ सँ क्षणिक सम्झौता ककेँ दीर्घकालिन सवाल सभ के अल्पकालिन बिराम दएत अछि, ओ सभ । इ ठीक बात नए । अर्थात् दिशाहिन भकँे मधेश मुद्दा के दिग्भ्रमति आ विषयान्तर केला सँ मधेशी अधिकार सम्पन्न कोनाकेँ होएत । संविधानसभा मे समावेशीक विधेयक कोना कँ पास कराओल जाए, एक मधेश प्रदेशक माग कोना क संविधान मे संवोधन होएत, अप्पन भेषभूषा आ भाषा–संस्कृतिक जर्गेना कोना के होएत तेँम्हर हुनका लोकनी के चिन्ता विल्कुले नए । ओ सभ ‘युज ब्याट्री’ जका बनि रहल अछि । ओ किछ समय बरैत अछि मुदा जल्दिए मिझा जायत अछि । कोयला के आगि बनबाक चाही , पकडैत देर रहैक अछि जौ पकैड लेलक त लम्बा समय आगि बुझाइत नय  । एतह गौठा क आगि बैन काज नए चलत । समावेशिक विधेयक दिश मधेशी नेतासभ के ध्यान देमे टा पडत । मन लुभावन भाषण त ओ दैत अछि मुदा किछु समय अन्तरालक बाद ओ भाषण जनताक लेल अनसुहाएत (मन असुभावन) बनि जाएत अछि ।  अहि सँ मधेशियाकेँ स्वायततासहित के संघियता नय भेटत । संविधानसभा मे संविधान निर्माणक लेल सक्रियता आ दबाब देबाक अग्रपंक्ति मे मधेशी नेता, कार्यकर्ता आ सभासद सभ केँ होमे चाहीँ । मुदा ओ सभ अप्पन मुद्दा के छोडि सत्ता के इर्दगिर्द आन दल जका लागि जाएत अछि ।एहाँ बड पैघ विडम्बना अछि हुनका लोकनिककेँ । संविधान मधेशी, मुस्लिम, थारु, जनजाति, आदिवासी, दलित सभ के चाहीँ । ई जातिसभक प्रतिनिधित्व रहल पार्टी सभ के सभसेँ आगा रहबाक चाहीँ संविधान निर्माण प्रक्रिया मे । मुद्दा सबसेँ पछा अछि । जहाँ तक संविधानसभा माग के माँगक बात अछि , ओ छ दशक पहिले उठाओल गेल छल । तत्कालीन राजा त्रिभूवन सन् २००७ मे अपन शाही घोषणा मेँ संविधानसभा निर्वाचनक वाचा केने छल , मुद्दा हुनक बेटा महेन्द्र आ पोता वीरेन्द्र सेहो नय पुरा करि सकल छल । जनआन्दोलन–२ आ पुनस्थार्पित प्रतिनिधिसभा आ तत्कालिन विद्रोही समूह माओवादी के सहभागिता मे गठित व्यवस्थापिका संसद सेँ अनुमोदित अन्तरिम संविधान–२०६३  संविधानसभाक  मार्गप्रशस्त केलक । बाद मे मधेश विद्रोह भेल आ देश संघियता मे गेल । अहिठाम ई कहि दि जे माओवादी संविधानसभाक लेल अग्रमोर्चा मे छल, एमाले त खुलिके अहि पक्ष मे कहियौ नए छल, जहाँ धरि नेपाली कांग्रेस के बात अछि ओकर एजेन्डा गणतान्त्रिक संविधानसभा नय थिक ।  एहेन परिस्थिति मे मधेश केन्द्रित दलक भूमिका अउर बड बेसी बढी जाएत अछि । मधेशी जनविद्रोह से प्राप्त उपलब्धि केँ लिपिबद्ध करबाक दिस सबगोटा के एकजूट भकेँ आगा बढ पडत ।

सहमति के लेल मात्र सहमति ः
प्रमुख राजनीतिक दलक बीच दिल्ली मे सम्पन्न १२ बुँदा सम्झौता सँ शुरु भेल सहमतिक बुँदागत शृंखला आजु धरि चालु अछि । पिछला समय संविधानसभा के म्याद थपबाक समय भेल पाँच बुँदा सहमति अखनि व्यावस्थापिक संसदक हैसियत मे सेहो रहल संविधानसभा के सम्पति अछि । अहि सहमति के आधार पँ जौ नेता सभ अगा बढत त निकास भँ सकैत अछि । अहि सँ पहिल सत्ताक बागडोर पाली–पाली लगा के करब से दुई पार्टी एमाले आ माओवादीक मुखिया सभ के बीच भेल सात बुँदा सम्झौता अमूतै छल । प्रमुख तीन दलसभ सत्ताक भागबन्डा मे केन्द्रित भ सहमति आ सम्झौता करैत आबि रहल अछि । मुदा आन्दोलनकारी शक्ति सभ सँ भेल सहमति अप्पन–अप्पन अधिकार के प्रत्याभूतिक साथ सुनिश्चिताक लेल होयत रहल अछि । मधेशी जनअधिकार फोरम नेपालक साथ बिस २०६४ भादव १२ गते २२ बुँदा सम्झौताक साथ शुरू भेल मधेशी सभक बुँदागत सम्झौताक शृंखला फागुन १६ के टेकैत फोरम नेपाल सरकार मे जाय सँ पहिल भेल चार बुँदा सम्झौता धरि आबैत एकटा मधेश राजनीति के रोडम्याप तयार कए चुकल अछि । ओकरा अप्पन आधार बनबैत आगा बढी त बेसी निक रहत । मधेशी लगायत के क्षेत्र के अधिकार आ मधेश विद्रोह के उपलब्धि सभ के लिपिबद्ध कएबाक लेल विगत के सहमति भेल छल । मुद्दा अखनो धरि मधेशीयाक मागक संवोधन सविधान मे नय भँ सकल अछि , एही सँ पीडा दायक बात आउर कि भँ सकैत अछि । १२ बुँदा समझदारी तत्कालिन माओवादी आ सातदल बीच मे सहकार्यकेँ रोडम्याप निर्धारण केलक छल । ओतह सँ यतह धरि पहुँचैत शान्तिप्रक्रिया आ नयाँ संघियतायुक्त संविधान निर्माणक दुई ठोस एजेन्डा मे संविधानसभा मे रहल सभ दल प्रतिबद्ध बनल बात राजनीतिक यथार्थक रुप मे सभ के समक्ष स्पष्ट अछि । एहा विश्वास के आधार पँ संविधानसभाक निर्वाचन मे जनता मतदान केने छल । मुद्दा जनता के विश्वास विपरित अपने–अपने पूर्वाग्रह आ हठ के झाली आ मिरदंग पिटैए मे तल्लिन भेला सँ जनमानस मे आशंका उत्पन्न भेल स्वभाविक बात थिक । संविधान नय बनत से विश्वास जन–जन मे भँ रहल अछि । ताही लेल संविधान निर्माणक प्रक्रिया अगा कोना बढए ओही मुदा मे सहमति होमे त बड सकारात्मक रहत । जनता के ‘मनक लड्डु घि संग खाऊ’ वाला बात ओ भँ सकैत अछि ।
संविधानसभा किएक नय देलकसंविधान ?
अखन प्रमुख राजनीतिक पार्टी दिशाविहीन बनि गेल अछि । नेपाल मे संघियता आ गणतन्त्र के ठोस एवं स्पष्ट स्वरुपक निर्धारण आ एकरा बुझैबाला परिभाषा ओसभ अखनौ धरि नय देलाह । फलस्वरुप संविधान अमूर्त विषय बनैत जा रहल अछि । संविधान निर्माणक प्रक्रिया के बन्दकी राखी नेतासभ सत्ताखेति दिस ध्यान केन्द्रित कएने अछि , संविधान निर्माण नए होनाए के एहो कारण अछि । तहिना दल सभहक नेतागण सँ नियतबस सिर्जित समस्या सँ सेहो संविधान निर्माण मे अवरोध खडा भ रहल अछि । समस्या समस्या मे नए भँ समस्या स्वयंम दलसभ मे अछि । फलस्वरुप जनता के द्वारा देल गेल दुई वर्ष मे संविधान नय बनल । तकर बाद बेर–बेर म्याद थपैत आबि रहल अछि । मुद्दा आबो संविधान बनत से दाबी करबाक स्थिति मे एतह कियो नय अछि । संविधान नए बनबाक दोष प्रमुख राजनीतिक दल आ ओकर नेता सभ के लिए पडत । हरेक विकसित जसअपजसक पहिल भागिदार नेतृत्व केँ बनैटा पडत । किएक त देश दलसभ कँे नेतृत्व मे अछि । ओना दलक नेता अखन सबल, सक्षम आ सशक्त नेतृत्व नय दँ पाबै के कारणेँ पार्टी मे विद्यमान गुट, हुल आ दस्ता सभके नेतृत्व करैवाला व्यक्ति मे सीमित भ गेल अछि , ओ समग्र पार्टी के एकल नेतृत्व क्षमता गुमा चुकल अछि । दलसभ मे दलगत स्वार्थ हाबी अछि त नेता सभ मे व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा बढि गेला सँ शान्ति, संविधान गति नय पकडि रहल अछि । आ संविधान निर्माणक सवाल मे आशातित प्रगति नय भँ रहल अछि । बिमार पडल अछि शान्ति आ संविधान । एकर उपचार बड बेसी कठिन बुझायत अछि । किएत त असक्षम नेतृत्वक कारण राजनीतिक दल सभ दिग्भ्रमित भ चुकल अछि । जनता के मन मे आब संविधानसभा ‘बनारसक लडडु’ वाला कहबी मे परिणत भँ रहल अछि । एतबे नय जम्बो संविधानसभा मे स्वतन्त्र आ बौद्धिक बहस करैवाला व्यक्तित्व के अभाव, संविधानसभा के संसद मे परिणत कएनाय, संविधानसभा के गठन सँ अखिन धरि ओकरा सरकार गठन आ प्रधानमन्त्री निर्माण मे उपयोग कएनाय , संविधानसभा के द्वन्द्व समाधानक स्थल बनएनाएसहित के कारण समय सेहो संविधान निर्माण मे गतिरोध आनी रहल अछि । ऐहन स्थिति मे संविधान कोना बनत । इ त नेताक नेतागिरीक बात भेल । नेपालक नागरिक समाज सेहो अपन दायित्व सँ दुर भ गेल, भँ रहल अछि । दुर्भाग्य कहल जाय एतक नागरिक समाजक प्रतिनिधि कहनिहार सभ कोनो न कोनो दलक प्रवक्ता बनि बैसल अछि । दिन मे नागरिक समाज आ साँझ मे पार्टी कार्यकर्ता के भूमिका मे अछि, ओ । एतबे टा नय ओ विभिन्न पत्रिका मे स्तम्भ मार्फत् सन्त बचन आ उपदेश सेहो द रहल अछि । मुद्दा संविधान निर्माण बात ओ नए कए रहल अछि । जौ अन्तिम समय होएत त संविधानसभा के इर्दगिर्द सभा, समारोह आ अनशन शुरु कए दैत अछि ।  ऐहन त अछि यहिठामक बहुरुपियाँ नागरिक समाज के सदस्य सभ , तहन कोना बनत संविधान ।
समयमा संविधान बनाउने उपाय ः
अन्त्य मे जनता के जागरुक होमे वाला समय आबि गेल अछि । ओ स्वतः स्फूर्त जागि संविधानसभा के सदस्य सभ के क्रियाशिल बनेबाक दिस जौं अग्रसर नय होयत त संविधान कहियो नय बन से बुझि जाऊँ । जई देशक जनता जौ चेतनाशून्य आ दायित्वविमुख भँ जायत अछि , ओतह वेथिति आ अस्तव्यस्ताक संगैह सभदिस दादागिरी आ बाहुबलीक बोलबाला बढि जाति अछि । मधेशी जनता के विश्वास जितएबाक बात अखिनोधरि संविधानसभा सँ नय भेल अछि । भित्तर–भित्तर ओ कि केलक ओकर सार्थक अर्थ जनताक नजर मे नय रहेक छैक । मधेशी जनता के टटका–टटकी अनुभूति करै वाला कोनो काम नही भेल अछि । मालिकक घोषणा नोकर चाकर के रुप मे रहल मधेशी नेता सभहक जीभ मे एहन के गडी जाएत अछि जे चारु दिस ओहेँ ओकलैत आगा बढैत छति ओ । संविधानसभा मे ८० प्रतिशत काम भँ चुकल बातक आकाशवाणी होइते मधेशी नेता सभ ओकरे अप्पन उपलब्धी ठानी बक–बक कर लागैत अछि । अखनिधरि मधेशी बन्धु के संविधानसभा मे कोन कोन अधिकारक बात लिपीबद्ध भेल , ओ यथार्थ बुँदागत रुप मे बतेबाक लेल कियो मधेशी नेता आजुक तिथि धरि तयार नय अछि । माँग क लेल मागँ केला स किछु नय मिलैवला छैक । मधेशी त तराई कांग्रेस नाम सँ अप्पन पहिचानक लडाई शुरु केलक । अखनि अप्पन पहिचान, राज्य, भाषा, संस्कृतिक माग ओ घनिभूत रुप मे उठौने अछि । मुद्दा परिणाम हात लागे शुन्य के गणित सँ अगा नय बढी रहल अछि । संविधानसभा स मधेशी के अधिकारक सुनिश्चिता दीर्घकालिन रुपम से कोना होएत, कोनो अमुक सरकार आबे , मधेशियाक मुद्दा युनिभर्सल बनि जाए, ताही दिस सोचैटा पडत । मधेश जनविद्रोह के बाद प्राप्त भेल उपलब्धि के बैधानिक कोना के बनाओल जाए , ध्यान दिअ पडत । संविधानसभा के म्याद थपबाक अन्तिक क्षण मे मधेशी मोर्चा के नेता बनि १० हजार मधेशीक सहभागिता सेना मे चाहीँ आ अगल रेजिमेन्ट चाहीँ कहीँ के नय होयत । अहि बारे मे त बेर–बेर लिखित सम्झौते भेल अछि ने । कि मधेशी के सेना मे सहभागि भेल त ? जब जब मधेशी नेता सभ सँ इ माग ऊठौलक ओकर प्रतिकार भेल अछि, पहाडी मानसिकता वाला लोक सभ सँ । पिछला बेर सेहो सेना सँ प्रतिक्रिया आयल जे ‘मधेशियाक माग सम्भव नय अछि ।’ एही भनाई के नेता आ मन्त्री सेहो फरक शैली मे पुस्टियाई करैत आबि रहल अछि । वर्तमान रक्षामन्त्री विष्णु पौडेलक बात सुनब त ओ मधेशी नेता के प्रतिकार स्वरुप ‘लोयल लंग्युवेज’ मे आयल अछि । मुद्दा बहुत पावरफूल अछि । ओ कहला जे ‘मधेशीसहित के आदिवासी, दलित आ पिछडावर्र्गक लेल २८ प्रतिशत कोटा निर्धारित होयत । मधेशी समुदाय के लेल सेना के द्वारा ‘सबुज बटालियन’ बना चुकल अछि । नेपाल के कुल सेना ९२ हजार ७५३ मे सँ ६ हजार १९६ मधेशी समुयदाय अछि ।’ रक्षामन्त्री पौडेल के ई स्पस्टोक्ति के अर्थ बुझ्नाय किनको समस्या होयत से हमरा नय बुझायत अछि । हुनकर कहनाए के तात्पर्यअछि जे मधेशी के छुट्टे रेजिमेन्ट नए बनत आ मधेशी के सहभागिता सेना मे अइछे । एतबे नय जखन सेना के लेल विज्ञापन होएत अछि तँ सैनिक मुख्यालय स प्रतिक्रिया अबएत अछि जे मधेशी समुदाय सेना मे अबैए लेल नही चाहैत अछि आ सैनिक सेवा मधेशियाक छनौट मे नय अछि । ई बात सभ सँ एहाँ बुझाएत अछि जे मधेशी के सेना मे भर्ना कोनो भी हालत मे नय कएल जाए । सैनिक सेवा मे मधेशीयाक समावेशिकरण बात त एतह एकटा प्रतिनिधिमूलक उदाहरण मात्र थिक । कतेक एहनो माग अछि जाही मे  बेसी स बेसी मधेशी समैट सकैत छि ओ सभ पुरा आईधरि नए भेल अछि । मधेशियाक माग फूँसी गप्प बनि जायत अछि । ताहिलेल मधेशी नेता÷सभासद सभ के रणनीतिक आ कुटनीतिक तौरतरिका स आगा बढ पडत । समस्या के दीर्घकालिन समाधान के उपाय कि भ सकैत अछि , ओम्हर ध्यान देमे पडत । संविधानसभा स बनि रहल संविधान मे मधेशी के अधिकार कोनाक सुनिश्चित होयत ओही दिश जौ ठोस अडान आ अर्जूनदृष्टि के साथ ध्यान केन्द्रित करब त संविधान निर्धारित समय मे बनि सकैत अछि , नए त संविधान एकादेशक खिस्सा बनैसेँ कियो नए रोकी सकैत अछि । 

समय मे संविधान नए बनबाक कारण
ड्ड    विवादास्पद विषय मे गम्भिर छलफल अभाव
ड्ड    नागरिक समाज के शिथिलता
ड्ड     प्रमुख तीन पार्टी के ३–३ गुट क्रियाशिल
ड्ड    सत्ताधिश पार्टी मे सेहो प्रतिपक्ष
ड्ड    पार्टी सभ मे सक्षम नेतृत्वक रौदी
ड्ड     दलसभ सैद्धान्तिक ट्रयाक से बाहर
ड्ड     सत्ता स्वार्थ, नेतासभ मे अपने पास चाभी रखबाक ताक
ड्ड     विवादित मुद्दा मे तीन दल के मूह तीन दिश
ड्ड     संविधानसभा मे स्वतन्त्र आ बौद्धिक छलफल कएनिहारक अभाव
ड्ड     संविधानसभा संसद मे परिणत कएल गेल
ड्ड     लिबरल डेमोक्रेसी (पूर्ण लोकतान्त्रिक) आ पिपुल्स रिपब्लिक डेमोक्रेसीबीच प्रतिस्पर्धा

संविधान निर्माणमा सबै भन्दा बढी सक्रिय हुनुपर्ने पक्ष (क्रमैसंग माथिबाट तलतिर)
ड्ड    मधेशी नेतृत्व मे रहल दलसभ आ मधेशी सभासद
ड्ड    दलित, मुस्लिम, आदिवासि÷जनजातिलगायत के समूह आ सभासद
ड्ड     सीमान्तकृत समूह, वर्ग, क्षेत्र आ जातिक सरोकारवाला
ड्ड    अन्य किछुक छोटमोट दल आ सभासद
ड्ड    एमाओवादी सिंगो पार्टी आ ओकर सभासद
ड्ड     एमाले सिंगो पार्टी आ ओकर सभासद्
ड्ड     कांग्रेस सिंगो पार्टी आ ओकर सभासद्
ड्ड अन्य समूह, वर्ग र सरोकारबाला पक्ष

madheshi party

नेपालमे तीन दलीय लोकतन्त्र हावी
दिनेश यादव
राष्ट्रिय सहमतिय सरकार बनेबाक बात प्रमुख तीन दल केने छल । मुद्दा अखनो बहुमतिय पद्धति स सरकार बनेबाक स्थिति मे देश पहुँचल अछि । जेठ १४ के राति तिनु दलक नेतासभ पाँच बून्दे सहमति मे हस्ताक्षर सेहो केने छलाह । मुद्दा ओही पाँच बुँदा मे से दुटा मात्र पुरा भेल तीन मास मे । संविधानसभा स संविधान नए बनत से सोच जनता सभ मे विकसित भ रहल अछि । किएक त संविधानसभा मे १६ अरब रुपैया खर्च भ गेलअछि । संविधानसभा रणनीतिक स्थल बनल अछि । तलब, भत्ता आ सुविधा लेबाक जगह बनल अछि, संविधानसभा के सदस्य सभ क लेल । दल आ ओकर नेता सभ अप्पन बटम लाइन अखनो धरि निर्धारण नय क सकल अछि । कोन समय लुकायल जाय कोनो समय देखायल जाय, से स्थिति मे अछि नेता सभ । देश आ जनताक प्रति ओ संवेदनशिल आ जिम्मेवार नय अछि से अनुभूति जन–जन के भ रहल अछि । वर्तमान स्थिति मे कांग्रेस आ मधेशकेन्द्रित दल सभ के एक पक्षिय एजेन्डा झलनाथ खनाल के सत्ताच्युत करेबाक दिश केन्द्रित छल । ओ अही मे सफल त भेल मुदा देश गम्भिर संघट मे ओझरायल जायत अछि ।

संवाद आ राजनीति
संवादहीनता स बड बेसी खतरनाक स्थिति होइत अछि सार्थक संवाद के नय होनाए । विकास आ निकासक लेल सार्थक संवाद महत्वपूर्ण होयत अछि । मुद्दा नेपालक राजनीति में सार्थक संवादक स्थान धीरे–धीरे समाप्त भ रहल अछि । बैसारक के लेल बैसार, संवादक लेल संवाद आ सहमतिक लेल सहमति होयत त अछि मुद्दा निस्कर्षविहीन । अन्त मे बहुमतिय पद्धति के घोडा चढाबाक दिश नेतासभ जुटि जायते अछि । ताही लेल त एतक नेता सभबीच आजुधरि भेल कोनो संवाद आ सहमति सही ढंग स आ नियत समय पे कार्यान्वयन नय भ सकल अछि ।
बैसारक एजेण्डा एकेटा रहैतो निस्कर्ष पे ओ नय पहुँच सकैत अछि । नेताक लेल गायत्री आ मृत्युञ्जयमन्त्र बनल ‘शान्ति प्रक्रिया, संविधान निर्माण आ सेना समायोजन’ अनिश्चिते बनल अछि । नेतासभ बेर–बेर दिग्भ्रमित आ विषायान्तर भ जायत अछि, ताही द्वारा देश के नयाँ संविधान नय भेट रहल अछि । समस्याक समाधान दिश जौ ध्यान नय द के संवाद आ बैसार होयत त गम्भिर विषय आ मुद्दा के विवेचन आ विश्लेषण सही ढंग स कोना के भ सकत ? राजनीति दल दलीय पूर्वाग्रह से ग्रसित भेला छ स्वच्छ बहसक परम्परा के अपनेबाक लेल ओ हिचकिचायत अछि । अही स्थिति मे कोनो निष्कर्स कोनाक निकलत ? आजुधरि शान्ति, संविधान आ सेना समायोजनक मुद्दा निष्कर्ष प नय पहुँचेबाक दोष दल सभ एक दोसर पर थोपारि दैत अछि, ओ आरोप–प्रत्यारोपक झडी लगेबाक दिश उन्मुख भ जायत अछि । मुदा समस्या समाधानक जडधरि पहुँचेबाक दिश एकाग्र भ के ओ ठोस निर्णय मे नय पहुँच सैक रहल अछि । सभ दल कोनो न कोनो रुप स सत्ता के सुखभोग करबाक ताक मे सदैब रहैत अछि ।

तीन दल आ लोकतन्त्र
अमेरिका में जेना दुईदलिय लोकतन्त्र अछि , नेपालक मे तेहने लोकतन्त्र अछि । ओतेह दुइटा दल मात्र, एतेह तीन दलीय लोकतन्त्र हाबी अछि । संविधानसभा मे बांकी आन दलक कोनो ‘भ्यालु’ आ मौजर नए अछि से कहबाक स्थिति एतेह अछि । हाँ, सत्ता से बाहर भेला पर मधेशवादी दल सभक बुद्धि खुजल जे ओ चौथा शक्ति बनबाक फेर मे जी जान स लागल अछि । एतबे कहाँ , तीनटा दल मे स कोनो एकटा के नेतृत्व मे जौ सरकार बनत , तबो मधेशी के विपक्ष मे निर्णय करेबाक समय मे ओ सब एके भजायत अछि । अमेरिका मे दुई दल मे से कोनो सत्ता मे जौ आयत त ओकर नीति आ कार्यक्रम मे कोनो परिवर्तन नय होयत अछि । अमेरिका मे दुई दल अछि यतह दुई दलक गठबन्धन मे जोड दैति आबि रहल अछि । तिसरका दल त सब दिन विपक्ष मे रहैत अछि । आन दल त ओही गठबन्धन मे नांगैर पकडी कोनो धरानी राजनीतिक बैतनी पार करबाक बाट जोहै मे रहैत अछि । ऐहन अवस्था मे जौ लोकतन्त्र पहुँचत त सभ स मुस्किलबला बात जनपक्षीय राजनीति के बचेनाय भ जाय अछि । कियकी ओही समय मे एहन स्थिति बनि जायत अछि के या त अहाँ पहिल वाला गठबन्धन मे सामेल भ जाऊ या दोसर वाला मे । मुदा लोकतन्त्रक सफलता ओकर बहुआयामी चरित्र पर निर्भर होयत अछि । नेपाल मे संविधानसभाक निर्वाचन के बाद प्रचलित दुई गठबन्धनक चिरफार जौ करल जाय त स्पष्ट होयत जे एकरा सभक एकेटा कुटनीतिक चाल सदैव समान रहल , छोटका आ क्षेत्रीय दल सभ के सत्ताक लालच देखा–देखा क गठबन्धन मे सामिल केनाय । जौ एहो से नय भेल त फुटा देनाय । एकर बाद धीरे–धीर ओ दलसभ के कमजोर बनबैत अस्तित्वहीन बना देनाय, एतेक तीन दल के मनोबृति, संस्कृति आ परम्परा कायम भेल अछि । क्षेत्रिय दल सभ के सामने समस्या ई अछि जे पहिने त ओ सत्ता के लालच मे ओकरा सभक चंगुल मे फसि जायत अछि, तकर बाद ओतए स ओ निकली नय पावैत अछि । एहन अवस्था मे संवादहीनताक होनाय स्वाभाविक अछि । मुदा महत्वपूर्ण सवाल ई अछि जे नेपालक लोकतन्त्र मे जनपक्षीय राजनीति इ दु गठबन्धनक राजनीति स निकलि के लोकतन्त्र के बहुआयामीक कोना के बनि सकैत अछि  ? अही सवाल के एकेटा उत्तर अछि जे आपस मे सार्थक संवादक स्थिति बनाओल जाय , संवादहीनताक स्थिति तोडल जाय । लोकतन्त्र व्यक्ति स नय व्यक्ति के दिमाग से चलैत अछि , इ बात सब गोटा के बुझएटा पडत । खास के माओवादी, नेपाली कांग्रेस आ एमाले के नेता सभ के अही बात पे निक जका गम्भिर भ सोच पडत ।

‘सिनिसिज्म’ आ नेपाल
ऐतिहासिक जनआन्दोलन २०६२÷०६३ के जनादेश अनुरुप सम्पन्न संविधानसभाक म्याद समाप्त भेलो प नेपाली जनताक द्वारा मौन अनुमोदन कयल गेल एक वर्षक समयावधि सेहो समाप्त भ थप्पल गेल तीन माह सेहो समाप्ति ओर अछि । अए अवधि मे शान्ति प्रक्रियाक आधारभूत काम सम्पन्न कएबाक वाचा नेतासभ केने छलाह । मुदा कोनो उपलब्धि नय हासिल भ सकल । आब मंसिर १४ के बाट जोहै मे लागल अछि नेता सभ । देश निकास दिश नय जा अस्थिरता उन्मुख अछि । एकर आन बहुते कारण अछि । मुद्दा सभ स पैघ कारण मे राजनीतिक दल के अन्दर देखल गेल अन्तरकलह अछि । अही कारणे नेतासभ मे अस्पष्टता, अपने हस्ताक्षर कएल गेल सहमतिक कार्यान्वयन कएबाक दृढ शक्तिक अभाव, राजनीतिक दल सभकबीच मे दार्शनिक नय जातीय, साम्प्रदायिक एवं समुदायक कारण स अन्तरविरोध व्यापक रुप स सृजना भ रहल अछि , राज्य पुनः संरचना एवं अन्य महत्वपूर्ण काम तुरन्ते होयत से संभावना न्युन अछि । ई बात सभ नेपाली जनताक उत्साह, जोश, जाँगर आ अपेक्षा निराशा मे परिणत कए देने अछि । ‘सिनिसिज्म’ के स्थिति मे देश पहुँच गेल अछि । चारु दिश निराशाबाद आ नकारात्मकता के स्थिति अछि । जनताक भरोसा, उम्मिद नेतासभ मिल के समाप्त कए देने अछि । जनता आब बुझेँ लागल अछि जे एतक नेता सभ स देश मे किछु नय भ सकैत अछि ।
लोकतन्त्रक मतलब होइत अछि जे सभ दृष्टि आ बिचारक सम्मान करैत एक सशक्त राष्ट्र के रुप मे सहअस्तित्व के मार्ग पर चलनाय । मुद्दा आब जनता सभ अप्पन तमाम भेदभाव क भुला , फेर स एक बेर सडक पर अएबाक समय भ चुकल अछि । अही मे ऊर्जा आ प्रेरणा स भरल युवाक भूमिका अहम अछि आ रहत । किएकी ओ देशक सभ स पैघ सम्पदा थिक । मुद्दा दुर्भाग्य कहियो जे एतक युवा सभ अमुक पार्टीक लठैतीगिरी के ठेक्कापट्टाक नेतृत्व क रहल अछि । गुन्डागर्दी, लुटपाट आ मारधार मे क्रियाशिल अछि, ओ सभ ।  तख्खन देश के निकास कोनो के भेटत ?

नेता आ कुर्सी
एतह बढी रहल राजकोषिय घाटा आ कर्जाक बोझक कारण देशक स्थिति विकराल सेहो बनैत जा रहल अछि । बेर बेर बजेट अवैत अछि मुद्दा जनताक लेल कोनो कल्याणकारी योजना नय । योजना सभ नेताक भाषण आ सरकारी कागजी घोडा मे सीमित भेल अछि । देशक कमजोर वर्ग खास कए के मधेशी, दलित, मुस्लिम, कर्णालिक बासिन्दाक आर्थिक स्थिति कमजोर भेला स ओ कमजोर समूह अन्तर्गत अबैत अछि । मुद्दा ई समूहक लेल सरकार के कोनो तत्कालिक राहत योजना नय अछि । सार्वजनिक सेवा सभ मे कटौति, रोजगारक घटि रहल अवसर आ निराशाजनक आर्थिक गतिविधिक कारण ई समूह सभ मे असन्तोष बहुत पहिले स छलैए हे, संक्रमणकालिन अहीँ अवस्था मे अउर बढि गेल अछि । मुद्दा अए दिश नेताक ध्यान किन्नौह नय । सबटा कुर्सी मे केन्द्रित अछि । संविधानसभा दिशाहीन बनि गेलअछि । दल सभ निर्देशित लक्ष्य प्राप्ति दिश कोनो ध्यान नय द खाली प्रधानमन्त्री आ मन्त्रीक कुर्सी आ सरकार निर्माण मे बड बेसी समय खर्च क रहल अछि । आब त संविधान सभाक विगटनक बात से हो उठी रहल अछि । ई स्वभाविक बात थिक । संविधान नय बनाबी मुदा भत्ता, सत्ता आ सुविधा भोग के नय छोडी, से मनस्थिति मे अछि नेता सभ । आब संविधानसभा के जिन्दा राखै के लेल संविधानसभा के सदस्य लोकनिक लेल कोनौ विवेकपूर्ण तर्क शेष नय रहि गेल अछि । संविधानसभाक लेल नयाँ जनादेश मे जेबाक समय आब आबि चुकल अछि । चुनाव मे भाग लेबाक जनताक संवैधानिक हक होयत अछि । ओही हक अधिकार के नेता सभ सूली प लटकाबैत लोकतन्त्रक आत्मा प सेहो प्रहार करैत संविधानसभा के म्याद बेर बेर थप्पलक , मुदा संविधान नय बनौलक । ताही लेल आब अहीं शैली मे परिवर्तन जरुरी अछि । भाषणक लेल सहमति मुद्दा अखनी धैर जतेक निर्णय भेल अछि संविधानसभाक निर्वाचनक बाद अधिकांश बहुमतिय पद्धति के आधार पर भेल अछि । जौ संविधानसभा मे कोनो जटिल आ विवादास्पद बात होयत अछि पार्टी सभ मे त अप्पन–अप्पन भोट बैंक के ध्यान रखैत ओ निर्णय सर्वोच्च अदालत स कएबाक फेर मे रहैत अछि । पिछला बेर पोशाकक निर्णय मे एहा बात भेल अछि । देखियौ, विश्व के ६० स अधिक देश मे विवादास्पद विषय के समाधान जनमत संग्रह के आधार पर से कएल गेल अछि । मुदा एतेह अमुक नेताक मत के आधार प निर्णय लाधल जायत अछि । ई जनताके मताधिकारके उलंघन नए त और कि थिक ? नव जनादेशक सेहो समस्या समाधानक विकल्प बनि सकैत अछि ।
अन्त्यमे,
शान्ति प्रक्रिया आ संविधान निर्माणक लेल एतेक सभ दल के अप्पन–अप्पन हठ आ सिद्धान्त के त्याग कर पडत । खास के माओवादी, कांग्रेस आ एमाले के त बड बेसी हठ त्याग करबाक परिस्थिति अछि । एक दोसर पर दोष थुपारि के समस्या के समाधान किन्नौह नय होयत । सभ के सहमतिय आधार मे निष्कर्स मे पुगैह टा पडत । प्रधानमन्त्री के कुर्सी परिवर्तनशिल होयत अछि । मुदा संविधानसभा से बनल संविधान बेर–बेर देश आ जनता के नय भेटैत अछि । ताहीले प्रधानमन्त्रीक कुर्सी आ सरकारक चाभी कब्जा दिश नेता सभ के ध्यान कम जेबाक चाही । माओवादी मे प्रचण्ड नय त कियो नय, एमाले मे अपन नेतृत्व के सरकार नय त दोसर कोनो दल नय, कांग्रेस मे सहमतिय सरकार के नेतृत्व नय त प्रतिपक्ष मे रहैवला बात परिपक्व राजनीतिक संस्कार नय अछि । माओवादी के ‘मेरो गोरु बाह्रै टक्का’ त्याग करै पडत । एमाले के ‘ताक परे तिवारी नत्र गोतामे’ वाला बात क छोडै पडत । तहिना कांग्रेस के ‘आप भला तो जग भला’ बात के अपनबैत आगा बढैत देश के निकास देबाक दिस अग्रसर होमे पडत । मधेशवादी दल सभ के सेहो ‘सत्ता मे छि त सभ ठीक बाहर छि त सभ बेठीक’ बला संस्कार के त्याग करैत देश आ मधेश के जनता के पक्ष मे काम कएबाक दिश अर्जुन दृष्टि राख पडत । तीन दलिय लोकतन्त्र स संविधान कहियो नए बनत ।