नेपालमे तीन दलीय लोकतन्त्र हावी
दिनेश यादव
राष्ट्रिय सहमतिय सरकार बनेबाक बात प्रमुख तीन दल केने छल । मुद्दा अखनो बहुमतिय पद्धति स सरकार बनेबाक स्थिति मे देश पहुँचल अछि । जेठ १४ के राति तिनु दलक नेतासभ पाँच बून्दे सहमति मे हस्ताक्षर सेहो केने छलाह । मुद्दा ओही पाँच बुँदा मे से दुटा मात्र पुरा भेल तीन मास मे । संविधानसभा स संविधान नए बनत से सोच जनता सभ मे विकसित भ रहल अछि । किएक त संविधानसभा मे १६ अरब रुपैया खर्च भ गेलअछि । संविधानसभा रणनीतिक स्थल बनल अछि । तलब, भत्ता आ सुविधा लेबाक जगह बनल अछि, संविधानसभा के सदस्य सभ क लेल । दल आ ओकर नेता सभ अप्पन बटम लाइन अखनो धरि निर्धारण नय क सकल अछि । कोन समय लुकायल जाय कोनो समय देखायल जाय, से स्थिति मे अछि नेता सभ । देश आ जनताक प्रति ओ संवेदनशिल आ जिम्मेवार नय अछि से अनुभूति जन–जन के भ रहल अछि । वर्तमान स्थिति मे कांग्रेस आ मधेशकेन्द्रित दल सभ के एक पक्षिय एजेन्डा झलनाथ खनाल के सत्ताच्युत करेबाक दिश केन्द्रित छल । ओ अही मे सफल त भेल मुदा देश गम्भिर संघट मे ओझरायल जायत अछि ।
संवाद आ राजनीति
संवादहीनता स बड बेसी खतरनाक स्थिति होइत अछि सार्थक संवाद के नय होनाए । विकास आ निकासक लेल सार्थक संवाद महत्वपूर्ण होयत अछि । मुद्दा नेपालक राजनीति में सार्थक संवादक स्थान धीरे–धीरे समाप्त भ रहल अछि । बैसारक के लेल बैसार, संवादक लेल संवाद आ सहमतिक लेल सहमति होयत त अछि मुद्दा निस्कर्षविहीन । अन्त मे बहुमतिय पद्धति के घोडा चढाबाक दिश नेतासभ जुटि जायते अछि । ताही लेल त एतक नेता सभबीच आजुधरि भेल कोनो संवाद आ सहमति सही ढंग स आ नियत समय पे कार्यान्वयन नय भ सकल अछि ।
बैसारक एजेण्डा एकेटा रहैतो निस्कर्ष पे ओ नय पहुँच सकैत अछि । नेताक लेल गायत्री आ मृत्युञ्जयमन्त्र बनल ‘शान्ति प्रक्रिया, संविधान निर्माण आ सेना समायोजन’ अनिश्चिते बनल अछि । नेतासभ बेर–बेर दिग्भ्रमित आ विषायान्तर भ जायत अछि, ताही द्वारा देश के नयाँ संविधान नय भेट रहल अछि । समस्याक समाधान दिश जौ ध्यान नय द के संवाद आ बैसार होयत त गम्भिर विषय आ मुद्दा के विवेचन आ विश्लेषण सही ढंग स कोना के भ सकत ? राजनीति दल दलीय पूर्वाग्रह से ग्रसित भेला छ स्वच्छ बहसक परम्परा के अपनेबाक लेल ओ हिचकिचायत अछि । अही स्थिति मे कोनो निष्कर्स कोनाक निकलत ? आजुधरि शान्ति, संविधान आ सेना समायोजनक मुद्दा निष्कर्ष प नय पहुँचेबाक दोष दल सभ एक दोसर पर थोपारि दैत अछि, ओ आरोप–प्रत्यारोपक झडी लगेबाक दिश उन्मुख भ जायत अछि । मुदा समस्या समाधानक जडधरि पहुँचेबाक दिश एकाग्र भ के ओ ठोस निर्णय मे नय पहुँच सैक रहल अछि । सभ दल कोनो न कोनो रुप स सत्ता के सुखभोग करबाक ताक मे सदैब रहैत अछि ।
तीन दल आ लोकतन्त्र
अमेरिका में जेना दुईदलिय लोकतन्त्र अछि , नेपालक मे तेहने लोकतन्त्र अछि । ओतेह दुइटा दल मात्र, एतेह तीन दलीय लोकतन्त्र हाबी अछि । संविधानसभा मे बांकी आन दलक कोनो ‘भ्यालु’ आ मौजर नए अछि से कहबाक स्थिति एतेह अछि । हाँ, सत्ता से बाहर भेला पर मधेशवादी दल सभक बुद्धि खुजल जे ओ चौथा शक्ति बनबाक फेर मे जी जान स लागल अछि । एतबे कहाँ , तीनटा दल मे स कोनो एकटा के नेतृत्व मे जौ सरकार बनत , तबो मधेशी के विपक्ष मे निर्णय करेबाक समय मे ओ सब एके भजायत अछि । अमेरिका मे दुई दल मे से कोनो सत्ता मे जौ आयत त ओकर नीति आ कार्यक्रम मे कोनो परिवर्तन नय होयत अछि । अमेरिका मे दुई दल अछि यतह दुई दलक गठबन्धन मे जोड दैति आबि रहल अछि । तिसरका दल त सब दिन विपक्ष मे रहैत अछि । आन दल त ओही गठबन्धन मे नांगैर पकडी कोनो धरानी राजनीतिक बैतनी पार करबाक बाट जोहै मे रहैत अछि । ऐहन अवस्था मे जौ लोकतन्त्र पहुँचत त सभ स मुस्किलबला बात जनपक्षीय राजनीति के बचेनाय भ जाय अछि । कियकी ओही समय मे एहन स्थिति बनि जायत अछि के या त अहाँ पहिल वाला गठबन्धन मे सामेल भ जाऊ या दोसर वाला मे । मुदा लोकतन्त्रक सफलता ओकर बहुआयामी चरित्र पर निर्भर होयत अछि । नेपाल मे संविधानसभाक निर्वाचन के बाद प्रचलित दुई गठबन्धनक चिरफार जौ करल जाय त स्पष्ट होयत जे एकरा सभक एकेटा कुटनीतिक चाल सदैव समान रहल , छोटका आ क्षेत्रीय दल सभ के सत्ताक लालच देखा–देखा क गठबन्धन मे सामिल केनाय । जौ एहो से नय भेल त फुटा देनाय । एकर बाद धीरे–धीर ओ दलसभ के कमजोर बनबैत अस्तित्वहीन बना देनाय, एतेक तीन दल के मनोबृति, संस्कृति आ परम्परा कायम भेल अछि । क्षेत्रिय दल सभ के सामने समस्या ई अछि जे पहिने त ओ सत्ता के लालच मे ओकरा सभक चंगुल मे फसि जायत अछि, तकर बाद ओतए स ओ निकली नय पावैत अछि । एहन अवस्था मे संवादहीनताक होनाय स्वाभाविक अछि । मुदा महत्वपूर्ण सवाल ई अछि जे नेपालक लोकतन्त्र मे जनपक्षीय राजनीति इ दु गठबन्धनक राजनीति स निकलि के लोकतन्त्र के बहुआयामीक कोना के बनि सकैत अछि ? अही सवाल के एकेटा उत्तर अछि जे आपस मे सार्थक संवादक स्थिति बनाओल जाय , संवादहीनताक स्थिति तोडल जाय । लोकतन्त्र व्यक्ति स नय व्यक्ति के दिमाग से चलैत अछि , इ बात सब गोटा के बुझएटा पडत । खास के माओवादी, नेपाली कांग्रेस आ एमाले के नेता सभ के अही बात पे निक जका गम्भिर भ सोच पडत ।
‘सिनिसिज्म’ आ नेपाल
ऐतिहासिक जनआन्दोलन २०६२÷०६३ के जनादेश अनुरुप सम्पन्न संविधानसभाक म्याद समाप्त भेलो प नेपाली जनताक द्वारा मौन अनुमोदन कयल गेल एक वर्षक समयावधि सेहो समाप्त भ थप्पल गेल तीन माह सेहो समाप्ति ओर अछि । अए अवधि मे शान्ति प्रक्रियाक आधारभूत काम सम्पन्न कएबाक वाचा नेतासभ केने छलाह । मुदा कोनो उपलब्धि नय हासिल भ सकल । आब मंसिर १४ के बाट जोहै मे लागल अछि नेता सभ । देश निकास दिश नय जा अस्थिरता उन्मुख अछि । एकर आन बहुते कारण अछि । मुद्दा सभ स पैघ कारण मे राजनीतिक दल के अन्दर देखल गेल अन्तरकलह अछि । अही कारणे नेतासभ मे अस्पष्टता, अपने हस्ताक्षर कएल गेल सहमतिक कार्यान्वयन कएबाक दृढ शक्तिक अभाव, राजनीतिक दल सभकबीच मे दार्शनिक नय जातीय, साम्प्रदायिक एवं समुदायक कारण स अन्तरविरोध व्यापक रुप स सृजना भ रहल अछि , राज्य पुनः संरचना एवं अन्य महत्वपूर्ण काम तुरन्ते होयत से संभावना न्युन अछि । ई बात सभ नेपाली जनताक उत्साह, जोश, जाँगर आ अपेक्षा निराशा मे परिणत कए देने अछि । ‘सिनिसिज्म’ के स्थिति मे देश पहुँच गेल अछि । चारु दिश निराशाबाद आ नकारात्मकता के स्थिति अछि । जनताक भरोसा, उम्मिद नेतासभ मिल के समाप्त कए देने अछि । जनता आब बुझेँ लागल अछि जे एतक नेता सभ स देश मे किछु नय भ सकैत अछि ।
लोकतन्त्रक मतलब होइत अछि जे सभ दृष्टि आ बिचारक सम्मान करैत एक सशक्त राष्ट्र के रुप मे सहअस्तित्व के मार्ग पर चलनाय । मुद्दा आब जनता सभ अप्पन तमाम भेदभाव क भुला , फेर स एक बेर सडक पर अएबाक समय भ चुकल अछि । अही मे ऊर्जा आ प्रेरणा स भरल युवाक भूमिका अहम अछि आ रहत । किएकी ओ देशक सभ स पैघ सम्पदा थिक । मुद्दा दुर्भाग्य कहियो जे एतक युवा सभ अमुक पार्टीक लठैतीगिरी के ठेक्कापट्टाक नेतृत्व क रहल अछि । गुन्डागर्दी, लुटपाट आ मारधार मे क्रियाशिल अछि, ओ सभ । तख्खन देश के निकास कोनो के भेटत ?
नेता आ कुर्सी
एतह बढी रहल राजकोषिय घाटा आ कर्जाक बोझक कारण देशक स्थिति विकराल सेहो बनैत जा रहल अछि । बेर बेर बजेट अवैत अछि मुद्दा जनताक लेल कोनो कल्याणकारी योजना नय । योजना सभ नेताक भाषण आ सरकारी कागजी घोडा मे सीमित भेल अछि । देशक कमजोर वर्ग खास कए के मधेशी, दलित, मुस्लिम, कर्णालिक बासिन्दाक आर्थिक स्थिति कमजोर भेला स ओ कमजोर समूह अन्तर्गत अबैत अछि । मुद्दा ई समूहक लेल सरकार के कोनो तत्कालिक राहत योजना नय अछि । सार्वजनिक सेवा सभ मे कटौति, रोजगारक घटि रहल अवसर आ निराशाजनक आर्थिक गतिविधिक कारण ई समूह सभ मे असन्तोष बहुत पहिले स छलैए हे, संक्रमणकालिन अहीँ अवस्था मे अउर बढि गेल अछि । मुद्दा अए दिश नेताक ध्यान किन्नौह नय । सबटा कुर्सी मे केन्द्रित अछि । संविधानसभा दिशाहीन बनि गेलअछि । दल सभ निर्देशित लक्ष्य प्राप्ति दिश कोनो ध्यान नय द खाली प्रधानमन्त्री आ मन्त्रीक कुर्सी आ सरकार निर्माण मे बड बेसी समय खर्च क रहल अछि । आब त संविधान सभाक विगटनक बात से हो उठी रहल अछि । ई स्वभाविक बात थिक । संविधान नय बनाबी मुदा भत्ता, सत्ता आ सुविधा भोग के नय छोडी, से मनस्थिति मे अछि नेता सभ । आब संविधानसभा के जिन्दा राखै के लेल संविधानसभा के सदस्य लोकनिक लेल कोनौ विवेकपूर्ण तर्क शेष नय रहि गेल अछि । संविधानसभाक लेल नयाँ जनादेश मे जेबाक समय आब आबि चुकल अछि । चुनाव मे भाग लेबाक जनताक संवैधानिक हक होयत अछि । ओही हक अधिकार के नेता सभ सूली प लटकाबैत लोकतन्त्रक आत्मा प सेहो प्रहार करैत संविधानसभा के म्याद बेर बेर थप्पलक , मुदा संविधान नय बनौलक । ताही लेल आब अहीं शैली मे परिवर्तन जरुरी अछि । भाषणक लेल सहमति मुद्दा अखनी धैर जतेक निर्णय भेल अछि संविधानसभाक निर्वाचनक बाद अधिकांश बहुमतिय पद्धति के आधार पर भेल अछि । जौ संविधानसभा मे कोनो जटिल आ विवादास्पद बात होयत अछि पार्टी सभ मे त अप्पन–अप्पन भोट बैंक के ध्यान रखैत ओ निर्णय सर्वोच्च अदालत स कएबाक फेर मे रहैत अछि । पिछला बेर पोशाकक निर्णय मे एहा बात भेल अछि । देखियौ, विश्व के ६० स अधिक देश मे विवादास्पद विषय के समाधान जनमत संग्रह के आधार पर से कएल गेल अछि । मुदा एतेह अमुक नेताक मत के आधार प निर्णय लाधल जायत अछि । ई जनताके मताधिकारके उलंघन नए त और कि थिक ? नव जनादेशक सेहो समस्या समाधानक विकल्प बनि सकैत अछि ।
अन्त्यमे,
शान्ति प्रक्रिया आ संविधान निर्माणक लेल एतेक सभ दल के अप्पन–अप्पन हठ आ सिद्धान्त के त्याग कर पडत । खास के माओवादी, कांग्रेस आ एमाले के त बड बेसी हठ त्याग करबाक परिस्थिति अछि । एक दोसर पर दोष थुपारि के समस्या के समाधान किन्नौह नय होयत । सभ के सहमतिय आधार मे निष्कर्स मे पुगैह टा पडत । प्रधानमन्त्री के कुर्सी परिवर्तनशिल होयत अछि । मुदा संविधानसभा से बनल संविधान बेर–बेर देश आ जनता के नय भेटैत अछि । ताहीले प्रधानमन्त्रीक कुर्सी आ सरकारक चाभी कब्जा दिश नेता सभ के ध्यान कम जेबाक चाही । माओवादी मे प्रचण्ड नय त कियो नय, एमाले मे अपन नेतृत्व के सरकार नय त दोसर कोनो दल नय, कांग्रेस मे सहमतिय सरकार के नेतृत्व नय त प्रतिपक्ष मे रहैवला बात परिपक्व राजनीतिक संस्कार नय अछि । माओवादी के ‘मेरो गोरु बाह्रै टक्का’ त्याग करै पडत । एमाले के ‘ताक परे तिवारी नत्र गोतामे’ वाला बात क छोडै पडत । तहिना कांग्रेस के ‘आप भला तो जग भला’ बात के अपनबैत आगा बढैत देश के निकास देबाक दिस अग्रसर होमे पडत । मधेशवादी दल सभ के सेहो ‘सत्ता मे छि त सभ ठीक बाहर छि त सभ बेठीक’ बला संस्कार के त्याग करैत देश आ मधेश के जनता के पक्ष मे काम कएबाक दिश अर्जुन दृष्टि राख पडत । तीन दलिय लोकतन्त्र स संविधान कहियो नए बनत ।
दिनेश यादव
राष्ट्रिय सहमतिय सरकार बनेबाक बात प्रमुख तीन दल केने छल । मुद्दा अखनो बहुमतिय पद्धति स सरकार बनेबाक स्थिति मे देश पहुँचल अछि । जेठ १४ के राति तिनु दलक नेतासभ पाँच बून्दे सहमति मे हस्ताक्षर सेहो केने छलाह । मुद्दा ओही पाँच बुँदा मे से दुटा मात्र पुरा भेल तीन मास मे । संविधानसभा स संविधान नए बनत से सोच जनता सभ मे विकसित भ रहल अछि । किएक त संविधानसभा मे १६ अरब रुपैया खर्च भ गेलअछि । संविधानसभा रणनीतिक स्थल बनल अछि । तलब, भत्ता आ सुविधा लेबाक जगह बनल अछि, संविधानसभा के सदस्य सभ क लेल । दल आ ओकर नेता सभ अप्पन बटम लाइन अखनो धरि निर्धारण नय क सकल अछि । कोन समय लुकायल जाय कोनो समय देखायल जाय, से स्थिति मे अछि नेता सभ । देश आ जनताक प्रति ओ संवेदनशिल आ जिम्मेवार नय अछि से अनुभूति जन–जन के भ रहल अछि । वर्तमान स्थिति मे कांग्रेस आ मधेशकेन्द्रित दल सभ के एक पक्षिय एजेन्डा झलनाथ खनाल के सत्ताच्युत करेबाक दिश केन्द्रित छल । ओ अही मे सफल त भेल मुदा देश गम्भिर संघट मे ओझरायल जायत अछि ।
संवाद आ राजनीति
संवादहीनता स बड बेसी खतरनाक स्थिति होइत अछि सार्थक संवाद के नय होनाए । विकास आ निकासक लेल सार्थक संवाद महत्वपूर्ण होयत अछि । मुद्दा नेपालक राजनीति में सार्थक संवादक स्थान धीरे–धीरे समाप्त भ रहल अछि । बैसारक के लेल बैसार, संवादक लेल संवाद आ सहमतिक लेल सहमति होयत त अछि मुद्दा निस्कर्षविहीन । अन्त मे बहुमतिय पद्धति के घोडा चढाबाक दिश नेतासभ जुटि जायते अछि । ताही लेल त एतक नेता सभबीच आजुधरि भेल कोनो संवाद आ सहमति सही ढंग स आ नियत समय पे कार्यान्वयन नय भ सकल अछि ।
बैसारक एजेण्डा एकेटा रहैतो निस्कर्ष पे ओ नय पहुँच सकैत अछि । नेताक लेल गायत्री आ मृत्युञ्जयमन्त्र बनल ‘शान्ति प्रक्रिया, संविधान निर्माण आ सेना समायोजन’ अनिश्चिते बनल अछि । नेतासभ बेर–बेर दिग्भ्रमित आ विषायान्तर भ जायत अछि, ताही द्वारा देश के नयाँ संविधान नय भेट रहल अछि । समस्याक समाधान दिश जौ ध्यान नय द के संवाद आ बैसार होयत त गम्भिर विषय आ मुद्दा के विवेचन आ विश्लेषण सही ढंग स कोना के भ सकत ? राजनीति दल दलीय पूर्वाग्रह से ग्रसित भेला छ स्वच्छ बहसक परम्परा के अपनेबाक लेल ओ हिचकिचायत अछि । अही स्थिति मे कोनो निष्कर्स कोनाक निकलत ? आजुधरि शान्ति, संविधान आ सेना समायोजनक मुद्दा निष्कर्ष प नय पहुँचेबाक दोष दल सभ एक दोसर पर थोपारि दैत अछि, ओ आरोप–प्रत्यारोपक झडी लगेबाक दिश उन्मुख भ जायत अछि । मुदा समस्या समाधानक जडधरि पहुँचेबाक दिश एकाग्र भ के ओ ठोस निर्णय मे नय पहुँच सैक रहल अछि । सभ दल कोनो न कोनो रुप स सत्ता के सुखभोग करबाक ताक मे सदैब रहैत अछि ।
तीन दल आ लोकतन्त्र
अमेरिका में जेना दुईदलिय लोकतन्त्र अछि , नेपालक मे तेहने लोकतन्त्र अछि । ओतेह दुइटा दल मात्र, एतेह तीन दलीय लोकतन्त्र हाबी अछि । संविधानसभा मे बांकी आन दलक कोनो ‘भ्यालु’ आ मौजर नए अछि से कहबाक स्थिति एतेह अछि । हाँ, सत्ता से बाहर भेला पर मधेशवादी दल सभक बुद्धि खुजल जे ओ चौथा शक्ति बनबाक फेर मे जी जान स लागल अछि । एतबे कहाँ , तीनटा दल मे स कोनो एकटा के नेतृत्व मे जौ सरकार बनत , तबो मधेशी के विपक्ष मे निर्णय करेबाक समय मे ओ सब एके भजायत अछि । अमेरिका मे दुई दल मे से कोनो सत्ता मे जौ आयत त ओकर नीति आ कार्यक्रम मे कोनो परिवर्तन नय होयत अछि । अमेरिका मे दुई दल अछि यतह दुई दलक गठबन्धन मे जोड दैति आबि रहल अछि । तिसरका दल त सब दिन विपक्ष मे रहैत अछि । आन दल त ओही गठबन्धन मे नांगैर पकडी कोनो धरानी राजनीतिक बैतनी पार करबाक बाट जोहै मे रहैत अछि । ऐहन अवस्था मे जौ लोकतन्त्र पहुँचत त सभ स मुस्किलबला बात जनपक्षीय राजनीति के बचेनाय भ जाय अछि । कियकी ओही समय मे एहन स्थिति बनि जायत अछि के या त अहाँ पहिल वाला गठबन्धन मे सामेल भ जाऊ या दोसर वाला मे । मुदा लोकतन्त्रक सफलता ओकर बहुआयामी चरित्र पर निर्भर होयत अछि । नेपाल मे संविधानसभाक निर्वाचन के बाद प्रचलित दुई गठबन्धनक चिरफार जौ करल जाय त स्पष्ट होयत जे एकरा सभक एकेटा कुटनीतिक चाल सदैव समान रहल , छोटका आ क्षेत्रीय दल सभ के सत्ताक लालच देखा–देखा क गठबन्धन मे सामिल केनाय । जौ एहो से नय भेल त फुटा देनाय । एकर बाद धीरे–धीर ओ दलसभ के कमजोर बनबैत अस्तित्वहीन बना देनाय, एतेक तीन दल के मनोबृति, संस्कृति आ परम्परा कायम भेल अछि । क्षेत्रिय दल सभ के सामने समस्या ई अछि जे पहिने त ओ सत्ता के लालच मे ओकरा सभक चंगुल मे फसि जायत अछि, तकर बाद ओतए स ओ निकली नय पावैत अछि । एहन अवस्था मे संवादहीनताक होनाय स्वाभाविक अछि । मुदा महत्वपूर्ण सवाल ई अछि जे नेपालक लोकतन्त्र मे जनपक्षीय राजनीति इ दु गठबन्धनक राजनीति स निकलि के लोकतन्त्र के बहुआयामीक कोना के बनि सकैत अछि ? अही सवाल के एकेटा उत्तर अछि जे आपस मे सार्थक संवादक स्थिति बनाओल जाय , संवादहीनताक स्थिति तोडल जाय । लोकतन्त्र व्यक्ति स नय व्यक्ति के दिमाग से चलैत अछि , इ बात सब गोटा के बुझएटा पडत । खास के माओवादी, नेपाली कांग्रेस आ एमाले के नेता सभ के अही बात पे निक जका गम्भिर भ सोच पडत ।
‘सिनिसिज्म’ आ नेपाल
ऐतिहासिक जनआन्दोलन २०६२÷०६३ के जनादेश अनुरुप सम्पन्न संविधानसभाक म्याद समाप्त भेलो प नेपाली जनताक द्वारा मौन अनुमोदन कयल गेल एक वर्षक समयावधि सेहो समाप्त भ थप्पल गेल तीन माह सेहो समाप्ति ओर अछि । अए अवधि मे शान्ति प्रक्रियाक आधारभूत काम सम्पन्न कएबाक वाचा नेतासभ केने छलाह । मुदा कोनो उपलब्धि नय हासिल भ सकल । आब मंसिर १४ के बाट जोहै मे लागल अछि नेता सभ । देश निकास दिश नय जा अस्थिरता उन्मुख अछि । एकर आन बहुते कारण अछि । मुद्दा सभ स पैघ कारण मे राजनीतिक दल के अन्दर देखल गेल अन्तरकलह अछि । अही कारणे नेतासभ मे अस्पष्टता, अपने हस्ताक्षर कएल गेल सहमतिक कार्यान्वयन कएबाक दृढ शक्तिक अभाव, राजनीतिक दल सभकबीच मे दार्शनिक नय जातीय, साम्प्रदायिक एवं समुदायक कारण स अन्तरविरोध व्यापक रुप स सृजना भ रहल अछि , राज्य पुनः संरचना एवं अन्य महत्वपूर्ण काम तुरन्ते होयत से संभावना न्युन अछि । ई बात सभ नेपाली जनताक उत्साह, जोश, जाँगर आ अपेक्षा निराशा मे परिणत कए देने अछि । ‘सिनिसिज्म’ के स्थिति मे देश पहुँच गेल अछि । चारु दिश निराशाबाद आ नकारात्मकता के स्थिति अछि । जनताक भरोसा, उम्मिद नेतासभ मिल के समाप्त कए देने अछि । जनता आब बुझेँ लागल अछि जे एतक नेता सभ स देश मे किछु नय भ सकैत अछि ।
लोकतन्त्रक मतलब होइत अछि जे सभ दृष्टि आ बिचारक सम्मान करैत एक सशक्त राष्ट्र के रुप मे सहअस्तित्व के मार्ग पर चलनाय । मुद्दा आब जनता सभ अप्पन तमाम भेदभाव क भुला , फेर स एक बेर सडक पर अएबाक समय भ चुकल अछि । अही मे ऊर्जा आ प्रेरणा स भरल युवाक भूमिका अहम अछि आ रहत । किएकी ओ देशक सभ स पैघ सम्पदा थिक । मुद्दा दुर्भाग्य कहियो जे एतक युवा सभ अमुक पार्टीक लठैतीगिरी के ठेक्कापट्टाक नेतृत्व क रहल अछि । गुन्डागर्दी, लुटपाट आ मारधार मे क्रियाशिल अछि, ओ सभ । तख्खन देश के निकास कोनो के भेटत ?
नेता आ कुर्सी
एतह बढी रहल राजकोषिय घाटा आ कर्जाक बोझक कारण देशक स्थिति विकराल सेहो बनैत जा रहल अछि । बेर बेर बजेट अवैत अछि मुद्दा जनताक लेल कोनो कल्याणकारी योजना नय । योजना सभ नेताक भाषण आ सरकारी कागजी घोडा मे सीमित भेल अछि । देशक कमजोर वर्ग खास कए के मधेशी, दलित, मुस्लिम, कर्णालिक बासिन्दाक आर्थिक स्थिति कमजोर भेला स ओ कमजोर समूह अन्तर्गत अबैत अछि । मुद्दा ई समूहक लेल सरकार के कोनो तत्कालिक राहत योजना नय अछि । सार्वजनिक सेवा सभ मे कटौति, रोजगारक घटि रहल अवसर आ निराशाजनक आर्थिक गतिविधिक कारण ई समूह सभ मे असन्तोष बहुत पहिले स छलैए हे, संक्रमणकालिन अहीँ अवस्था मे अउर बढि गेल अछि । मुद्दा अए दिश नेताक ध्यान किन्नौह नय । सबटा कुर्सी मे केन्द्रित अछि । संविधानसभा दिशाहीन बनि गेलअछि । दल सभ निर्देशित लक्ष्य प्राप्ति दिश कोनो ध्यान नय द खाली प्रधानमन्त्री आ मन्त्रीक कुर्सी आ सरकार निर्माण मे बड बेसी समय खर्च क रहल अछि । आब त संविधान सभाक विगटनक बात से हो उठी रहल अछि । ई स्वभाविक बात थिक । संविधान नय बनाबी मुदा भत्ता, सत्ता आ सुविधा भोग के नय छोडी, से मनस्थिति मे अछि नेता सभ । आब संविधानसभा के जिन्दा राखै के लेल संविधानसभा के सदस्य लोकनिक लेल कोनौ विवेकपूर्ण तर्क शेष नय रहि गेल अछि । संविधानसभाक लेल नयाँ जनादेश मे जेबाक समय आब आबि चुकल अछि । चुनाव मे भाग लेबाक जनताक संवैधानिक हक होयत अछि । ओही हक अधिकार के नेता सभ सूली प लटकाबैत लोकतन्त्रक आत्मा प सेहो प्रहार करैत संविधानसभा के म्याद बेर बेर थप्पलक , मुदा संविधान नय बनौलक । ताही लेल आब अहीं शैली मे परिवर्तन जरुरी अछि । भाषणक लेल सहमति मुद्दा अखनी धैर जतेक निर्णय भेल अछि संविधानसभाक निर्वाचनक बाद अधिकांश बहुमतिय पद्धति के आधार पर भेल अछि । जौ संविधानसभा मे कोनो जटिल आ विवादास्पद बात होयत अछि पार्टी सभ मे त अप्पन–अप्पन भोट बैंक के ध्यान रखैत ओ निर्णय सर्वोच्च अदालत स कएबाक फेर मे रहैत अछि । पिछला बेर पोशाकक निर्णय मे एहा बात भेल अछि । देखियौ, विश्व के ६० स अधिक देश मे विवादास्पद विषय के समाधान जनमत संग्रह के आधार पर से कएल गेल अछि । मुदा एतेह अमुक नेताक मत के आधार प निर्णय लाधल जायत अछि । ई जनताके मताधिकारके उलंघन नए त और कि थिक ? नव जनादेशक सेहो समस्या समाधानक विकल्प बनि सकैत अछि ।
अन्त्यमे,
शान्ति प्रक्रिया आ संविधान निर्माणक लेल एतेक सभ दल के अप्पन–अप्पन हठ आ सिद्धान्त के त्याग कर पडत । खास के माओवादी, कांग्रेस आ एमाले के त बड बेसी हठ त्याग करबाक परिस्थिति अछि । एक दोसर पर दोष थुपारि के समस्या के समाधान किन्नौह नय होयत । सभ के सहमतिय आधार मे निष्कर्स मे पुगैह टा पडत । प्रधानमन्त्री के कुर्सी परिवर्तनशिल होयत अछि । मुदा संविधानसभा से बनल संविधान बेर–बेर देश आ जनता के नय भेटैत अछि । ताहीले प्रधानमन्त्रीक कुर्सी आ सरकारक चाभी कब्जा दिश नेता सभ के ध्यान कम जेबाक चाही । माओवादी मे प्रचण्ड नय त कियो नय, एमाले मे अपन नेतृत्व के सरकार नय त दोसर कोनो दल नय, कांग्रेस मे सहमतिय सरकार के नेतृत्व नय त प्रतिपक्ष मे रहैवला बात परिपक्व राजनीतिक संस्कार नय अछि । माओवादी के ‘मेरो गोरु बाह्रै टक्का’ त्याग करै पडत । एमाले के ‘ताक परे तिवारी नत्र गोतामे’ वाला बात क छोडै पडत । तहिना कांग्रेस के ‘आप भला तो जग भला’ बात के अपनबैत आगा बढैत देश के निकास देबाक दिस अग्रसर होमे पडत । मधेशवादी दल सभ के सेहो ‘सत्ता मे छि त सभ ठीक बाहर छि त सभ बेठीक’ बला संस्कार के त्याग करैत देश आ मधेश के जनता के पक्ष मे काम कएबाक दिश अर्जुन दृष्टि राख पडत । तीन दलिय लोकतन्त्र स संविधान कहियो नए बनत ।
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