मंगलवार, 17 जुलाई 2012

Madhesh and leader

मधेश और नेता
मनुष्यों को व्यवहार की इसलिए जरुरत होती है कि कुछ प्रकार की चूनौतियों का तत्काल , बिना बहस किए, मुकाबला करना पड्ता है । जिन चुनौतियों का मुकाबला तत्काल और सामूहिक ढंग से करना पड्ता है, आने वाली उन सारी चुनौतियों के लिए भावनाए“ तयार रहनी चाहिए । मेरी मां की कुरुपता पर मजाक करने वाले सज्जन को मैं कोई रोषपूर्ण वाक्य कहू“ या न कहू“, यह लम्बी बहस के बाद तय नहीं हो सकता । परन्तु यहा“ इस पर बहस करने मे हमारे नेता अग्रसर हैं । आज देश÷मधेश के नेताओं मे अपनी मातृभूमि का चीर हरण का कोइ गम नहीं । अपने जनता÷मतदाता के अधिकारों का कोई फिक्र नहीं ।  उन्हे सिर्फ सत्ता और भत्ता चाहिए । इसके लिए वह एक के बाद दुसरे फिर तिसरे बहस करने मे किन्चित नही हिचकते ।
मधेश और राष्ट्रिता
एक्का–दुक्का मधेशी नेता कहते आ रहे है कि नेपाल मे मधेशीओं की राष्ट्रीयता नहीं हैं  । यह बात कुछ हद मे सही भी हो सकते है । परन्तु क्या वह अपनी जनता के राष्ट्रीयता की बात ठोस रुप में कभी करी हैं । भाषण देना एक बात है, कार्यान्वयन करना दुसरी बात । अतित मे मधेश के भूमि और मधेशीओं के अस्मिता पर बार–बार आक्रमण हुआ है, मधेशियों के साथ परोसी मुल्क के सुरक्षा बलों द्वारा सीमा पर अत्याचार का चक्र जारी है । पर मौन क्यो है, वहां के जाने माने नेतागण । वैसे तो इसमे नेपाल के खस ब्राह्मणवादी सोच और पहाडिया मानसिकता भी कम गुनाहगार नही है । देखिए, राष्ट्रीयता एक सामूहिक भावना है जिसकी संस्कृति , जिसका व्यावहारिक रुप अलग–अलग हो सकता हैं । यह एक संकीर्ण भावना होगी या एक उदार भावना होगी, इसका रुझान साम्राज्यवादी होगा या इसका रुझान विश्व मैत्री की दिशा मे होगा, इसका अन्दुरुनी तेवर सामान्य जन के लिए अनुकूल है या एक विशिष्ट वर्ग के हित में है, यह इस पर निर्भर करता है कि समाज का नेतृत्व और बुद्धिजीवी वर्ग राष्ट्रीय भावना को किन नीतियो के साथ जोडकर अभिव्यक्ति करते हैं । परन्तु हमारे नेता देश हा“क्ने की बात तो करते है, अपने ही क्षेत्र को वह संभाल नही पार रहा हैं । वर्षौ से एक ही गाव, समाज और क्षेत्र मे बस रहे थारु, मुस्लिम और दलित मधेशीयों मधेश से कोशो दूर होते जा रहे है, इस के चिन्ता थोडा भी मधेशी नेताओं मे क्यो नहीं है ? वह सिर्फ सत्ता के लिए राजनीति करने के सूची मे अपने को सामेल करने मे क्यो तल्लिन हैं ? इस से मधेश एकसूत्र मे कभी भी बंध नही सकता है, टुटेगा और फुटेगा ही ?
मधेशी नेता और सत्ता
राजनीति मे सत्ता और भत्ता के लिए एकजुट सक्रियता को अलग करना मुश्किल है । ये दोनो एक दूसरे को छुपाते हुए एक साथ बहुरुपिया–कपट के साथ सक्रिय होते है । इसलिए तो मधेश केन्द्रित दलों मे छल और कपटपुर्ण विभाजन होता आ रहा हैं । सत्ता की बात जब–जब आती है मधेशी दल टूटती और फुट्ती है । पार्टीओं मे अन्तर्कलह पनपती है । इसके और ढेर सारे कारण  हो सकते है । उस मे एक हैः मधेशी समाज मे पूर्व–आधुनिक सामन्ती मूल्य–मान्यताओं की जकडबन्दी सबसे विकट होना । इसिलिए तो पिछले कुछ वर्षो से मधेशीओं के अधिकार प्राप्ति की राजनीतिक लडाई जातिवाद और सांप्रदायिक अस्मिताओ को लगातार सशक्त और सांस्थानीकृत किया है, वहां इनमे से किसी भी एक की चीर–फाड दूसरे की ‘फा“रेंसिक  रिपोर्ट’ बन जाती है । धर्म, साम्प्रदायिकता, जाति, क्षेत्रीयता, स्वार्थ और लगातार भ्रष्ट होती जाती राजनीति की बदौलत मधेश पतन की ओर अग्रसर हैं । दुसरे कारण ः मधेशी नेताओं मे पनप रहे क्षुद्र विचार और भाव मे हो रहे विचलन । इसिलिए तो उनमे एक दुसरे के नेतृत्व स्वीकार्ने की भावनाए“ दिनानुदिन कमी दिखाई दे रहा हैं । तिसरे कारण ः मधेशी नेताओं मे देशी÷विदेशी शक्तियो के लिए घोडा बनने की ललक । वह रथ के भारी को ढो तो रहें है, परन्तु सारथी बनकर नही , भरिया बनकर । सत्ता नामकी घा“स वह प्राप्त करते ही अपना सभी दायित्व और मार्गदर्शन भूल जाते है । यही उनके सबसे बढी कमजोरी रही है । उसे यस समझ मे आनी चाहिए की अब अबोधताओ और मासुमियतो के युग का अन्त हो चुका हैं । मधेशी जनता जाग चुकी है, अपने अधिकार प्राप्ति के आन्दोलन करने के लिए । ऐसे परिस्थिति मे सत्ता का भुख उसके लिए आत्मघाती ही नहीं मृत्युवरण का द्योतक भी बन सकता है । इसिलिए सरकार में जाने से पहले और बाद की बातों का वह हिसाब–किताब रखे । मधेशी जनता अपने नेताओं से एक–एक कर के व्याजसहित हिसाब लेने बाले हैं । इसके लिए वह तयार रहें, तभी सरकार मे वह जाए । संविधानसभा के निर्वाचन के बाद बने सरकारों मे ढेर सारे मधेशी समावेश हुए, परन्तु मधेश के हित के तुलनामा अहित मे ढेर सारे निर्णय हुईं हैं (तालिका देखें) । फिर मधेशी विरोधी निर्णय मे छाप लगाने के लिए ही वह सत्ता मे जाना क्यो चाहते हैं ?
मधेशी नेताओं मे विचलन
वह दौर जिसके नेतृत्व कर हमारे नेता आन्दोलन को मधेशीयों मे बदलाव का माध्यम बानाया, अपने समय, देश और काल की परिस्थितियों मे हस्तक्षेपका माध्यम बानाया, अपने पारदर्शी और प्रामाणिक कामकाज से हालात में बदलाव की कोशिश की , ऐसे मधेशी नेता मे भी वर्तमान मे दिखाई दे रही सत्ता की भुख उसका सर्वेसर्वाको गुम कर रहा है । इसकी चिन्ता और गम  उस मे किन्चित भी नहीं दिखाई देना दुर्भाग्य ही नही, सती जाने जैसी बात हैं । मधेश और मधेशी विरोधी शृंखलाबद्ध निर्णय के दौर मे विद्रोह और बगावत का रास्ता चुनना, कितना कठिन है, वह भुक्तभोगी ही जान सकते है । परन्तु उस कठिन घडी मे भी आन्दोलनको अख्तियार करने बाले मधेश मे शेष रहे एक÷दो नेता भी दिग्भ्रमित हो कर अमुक दल के पिछलग्गु बनने को तयार होना शोभा नही देता । अपने धराधलीय स्वभाव ही नही सादा रहन–सहन, खान–पान को छोड गलत रास्ते पर चलना उस के लिए अभिसाप भी बन सकता है । वर्तमान परिस्थिति मे अत्यंत सजग सावधान दृष्टि से उसे चलना चाहिए । देशीविदेशी शक्ति के पाव छुने से मधेश और मधेशी का कल्याण नहीं होने वाला है ।
अन्त्यमे, मधेश के ग्रामिण क्षेत्र मे असली नेपाल है, देश काठमाडौं मे नहीं बसता । यह हेक्का मधेशी नेताओं मे होने ही चाहिए । यस तभी संभव है, जब वह अपने सिद्धान्त, दायित्व और कर्तव्य को सर्वेसर्भा मानकर मधेशी के अधिकार प्राप्ति के लिए अपना अर्जून दृष्टि रखेगें । आज भी मधेश में सुझ और ऊर्जा देने वाले नेताओं का अभाव है , इसके लिए वह सदैव प्रयत्नशिल और लगनशिल रहें । सत्ता नही अधिकार प्राप्ति के लिए हमेशा वह सजग और सचेत रहें । 

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